यही सिलसिला चलेगा । देखना तुम । दिन रात बारिश होगी ।
दीवालें सीलने लगेगीं । सीने पर बैठा बाज और भारी होता जाएगा ।

बैसाख में जला पठार, अपनी ही भस्म में अँखुआ रहा ।
हर जानने वाले के घर घुटी सिसकियाँ हैं । सब अपनी पहलौंठी संतान को विदा कर रहे।
उन्हें, जिनके बिना जीना नहीं आता ।
छोटे शहरों की अजब व्यथा है । व्यथा की अपनी कथा ।

कथा में बच्चे बाहर जाते हैं, कॉपी, बस्ता संभाले ।
माएँ उनकी अनुपस्थिति में रोज़ दो रोटी बेसी बनातीं, साँझ के धुंधलके में गुपचुप बिसूरतीं एक -एक कौर लीलती पथराती चली जाती हैं ।
उनके हाथों से कोई नन्ही उँगली छूट गयी है ।
हौंक कर जागती वे आधी रात बीच नींद में, बासी प्रार्थनाएँ दोहराती।

जानती हैं पढ़ने गया बच्चा कोई और होकर लौटेगा ।
माँ संसार की सबसे निरीह प्राणी है,

उसकी छाती का बाज सबसे भारी।
जो उड़ाए नहीं उड़ता ।

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