“मां क्या पापा मुझे xbox दिलाएंगे?” 12 साल के दक्ष ने उम्मीद भरी निगाहों से रीना को देखा।

”पता नहीं बेटा” उसने टका सा जवाब दिया।

“माँ तुम क्या चाहती हो?”

“में तो नहीं चाहती कि सिर्फ game खेलने के लिए इतने पैसे खर्च किये जायें। फिर तुम computer में भी तो game खेलते हो न।”

“हां वो तो है पर computer में xbox वाला मजा कहाँ आता है मम्मा। और उसमें बढ़िया graphics भी दिखेंगे। बड़ी tv screen पर game खेलने का मज़ा ही कुछ और है।“ रीना से कुछ बोलते न बना।

दक्ष पिछले 1 महीने से रोज़ दिन में 4-6 बार xbox की बात छेड़ देता था। दिन भर एक ही बात सुन सुन कर रीना खीझने लगी थी। बस दक्ष का उत्साह देख के सीधे मना नही कर पाती थी।

दक्ष के मन मे भी संदेह तो जरूर था कि पापा उसकी बात नहीं मानेंगे, पर बाल मन कहाँ समझता है। कहीं न कहीं उम्मीद तो थी कि शायद उसकी बात मान ली जाय।

शाम को जब आशीष office से लौटा तो मौका देखते ही दक्ष फिर शुरू हो गया। मोबाइल फ़ोन में किसी shopping website का offer दिखाने लगा - “देखो पापा कितना अच्छा offer है। इसके साथ 3 game भी free मिल रहे हैं। और ऊपर से 10% discount भी मिल रहा है।“

आशीष ने देखने का नाटक करते हुए हाँ में हाँ मिला दी - “वाह ये तो सचमुच बहुत बढ़िया offer है बेटा।“ रीना की तरह वो भी एक ही बात सुन सुन कर bore हो चुका था।

ऐसा नहीं है की वो दक्ष को xbox दिला नहीं सकते. पर बच्चे को पैसे की value भी तो सिखानी जरूरी हैं. सिर्फ थोड़े से मजे के लिए इतने पैसे खर्च कर देना उनको बेवकूफी लग रही थी.

दक्ष के स्कूल के कई दोस्तों के पास xbox या play station था. और बच्चे रोज़ क्लास में अपने अपने गेम के बारे में बातें किया करते थे. दक्ष स्कूल से वापस आकर फिर से प्लानिग में लग जाता था. जैसे भी हो इस बार exams के बाद तो जरूर मैं xbox लूँगा. “अगर पापा नहीं दिलाएंगे तो में अपने पैसों से ले लूँगा.” उसने मम्मा से कहा.

कुछ सालों से रीना और आकाश दक्ष के बैंक अकाउंट में पैसे जमा कर रहे थे. जो अब बढ़ते बढ़ते इतने हो गए थे की बस xbox के दाम से थोड़े ही कम थे.

दक्ष को ये पता था. उसके पास यही एक आखरी रास्ता था.

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