हम सभी लोग जो भारत में रहते हैं उन सबने अपने माता पिता या रिश्तेदारों से कभी कभी ना कभी इस तरह की बातें सुनी होंगी जिनका कोई वैज्ञानिक साक्ष्य नहीं होता. बस वो पीढ़ियों से चले आ रहे विश्वास पर ही कायम होते हैं. जैसे बिल्ली का रास्ता काट जाना, दूध उबल जाना, या फिर आरती का दिया बुझ जाना ये सब आने वाले किसी अप्रिय घटना का संकेत होता है.

इसी तरह हर परिवार में त्योहारों या अनुष्ठानो जैसे शादी/ब्याह, मुंडन आदि से जुड़े हुए भी भिन्न भिन्न प्रकार के विचार होते हैं जैसे - मुंडन १ साल या ३ साल की उम्र में होना चाहिए, या फिर शादी अमुक अमुक महीने में नहीं होनी चाहिए, शादी के बाद गौना होना चाहिए या नहीं होना चाहिए.

इनमे से बहुत सारे धारणाये किसी ना किसी प्रकार से भूतकाल की घटनाओं से प्रेरित होती हैं. लोग अपने अनुभवों से किसी घटना के बारे में स्वयं भ्रम पाल लेते हैं और अपनी आने वाली पीढ़ियों को उसे अपनाने के लिए कहते हैं. इस तरह से अगली पीढ़ियों वो एक प्रथा का रूप ले लेती हैं. हो सकता है की इनमे बहुत सी बातें सत्य हो और उसे मानने से आने वाली पीढ़ियों को फायदा हो. मगर बहुत सारी निरर्थक प्रथाए भी इस तरह से प्रचलन में आ जाती हैं.

और चूंकि इन सब बातो का कोई तथ्य या प्रमाण नहीं होता, अगर हम इस बारे में कोई प्रश्न करते हैं तो एक ही जवाब मिलता है - की हमारे यहाँ पीढ़ियों से ऐसा होता आया है, इसके बारे में प्रश्न मत करो. हमारे पूर्वज मूर्ख नहीं थे.

मेरे पास इस बात का कोई प्रमाण नहीं है की विश्व की बाकी सभ्यताओं में भी ऐसा होता है या नहीं, पर मुझे ऐसा लगता है की ऐसा सब जगहों पर होता होगा.

हमें जरूरत है, इन सब पुरानी भ्रांतियों की व्यावहारिकता समझने की और उनका हानि लाभ जानने की.

आजकल देखा जाता है, की नयी पीढ़ी के लोग इन सबको बेवकूफी की बाते बोलकर पल्ला झाड लेते हैं. पर उनमें छुपे हुए विश्वास को समझने की कोशिश कोई नहीं करता. जैसा की मैंने ऊपर बताया पुरानी पीढ़ी के लोगों की समस्या ये होती है की, वो नयी पीढ़ी के इन प्रश्नों को समझने के बजाय, पुरानी प्रथाओं को पत्थर की लकीर मान के बैठे होते हैं. और अपनी बात से टस से मस नहीं होते.

उनका यही व्यवहार नयी पीढ़ी को उनसे दूर कर देता है. अगर दोनों तरफ के लोग एक दूसरे की मनोदशाओं को समझने का प्रयास करे तो दोनों को टकराव से मुक्ति मिल सकती है.

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