जब भी मैं अपने ८ साल के बेटे को हिंदी शब्दों का मतलब पूछते पाता हूँ, तो कहीं न कहीं ये सोचने पर मजबूर होना पड़ता है कि क्या हम इंग्लैंड के निवासी हैं या फिर भारत के. अंग्रेज़ी का इतना असर हमारे ऊपर कब और कैसे हो गया कि हम कब हिंदी भूल गए ये पता ही नहीं चला. छोटे शहरो में न सही पर महानगरों में तो ऐसा ही लगता है.

क्या हमें वाकई अंग्रेज़ी कि इतनी जरूरत है या फिर हम इसके चंगुल से निकल नहीं पाए हैं. कहीं ऐसा तो नहीं कि हम अपने आप को अंग्रेज़ी दां साबित करके, गर्व का अनुभव करते हैं. करते ही होंगे, वरना पार्क में २ साल के बच्चे से भी लोग अंग्रेज़ी में क्यूँ बात करते हैं. ऐसा तो नहीं कि वो लोग हिंदी में बात करना जानते ही नहीं.

मैं स्वतंत्र सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूँ, पिछले १३ सालों से कंप्यूटर पर अंग्रेज़ी में ही सब काम करता हूँ. मेरे सारे ग्राहक अमेरिका या यूरोप के किसी देश से होते हैं. मुझे उनसे अंग्रेजी में ही सब बातें करनी पड़ती हैं. पर मुझे अपने घर में या अपने जान पहचान के किसी भी आदमी या औरत से अंग्रेजी में बात करने कि जरूरत महसूस नहीं होती. हाँ कदाचित कुछ लोग जरूर हिंदी में पूछे गए प्रश्न का उत्तर भी अंग्रेजी में देते हैं.

मैं ये नहीं समझता कि अंग्रेजी नहीं सीखनी या बोलनी चाहिए. अंग्रेजी वैश्विक भाषा है. मैं तो चाहता हूँ कि अधिक से अधिक लोग अंग्रेजी पढ़ें और समझें. पर ऐसे नहीं कि ये भूल जाएँ कि हम पहले हिन्दुस्तानी हैं, और हिंदी हमारी मातृभाषा है. अंग्रेजी का प्रयोग तभी करें जब जरूरत हो. न कि अंग्रेजी बोल कर गर्व का अनुभव करें, और जो न बोल सके उसे हीन भावना से देखें.

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