ट्रेन में सफर करना बहुत ही इमोशनल होता है। पता नहीं क्यों मैं जब भी ट्रेन में सफर करता हूं , अपने आप मन भरी सा होने लगता है। चलती हुई ट्रेन से बाहर लोगो के घर देखना और उनको अपने काम ने व्यस्त देखना ना जाने क्यों मन को बेचैन कर देता है।

वो लोग अपने कामों में व्यस्त हैं और में एक रेलगाड़ी में बैठ कर सुदूर की यात्रा पर निकल पड़ा हूं। वो सब पीछे छूटते जा रहे हैं और मैं उन सब के बीच से आगे चला जा रहा हूं। जैसे आइंस्टीन की थ्योरी ऑफ रिलेटिविटी को यथार्थ होते देख रहा हूं।

हर रोज कोई न कोई इसी ट्रेन में बैठ कर निकलता होगा। क्या उसको भी ये खयाल आता होगा? उस समय मैं अपने ऑफिस में अपने काम में व्यस्त रहता हूं। फिर सोचता हूं ये हर समय होता होगा। हम अपने काम में व्यस्त रहते हैं और उसी समय हजारों या शायद लाखों लोग एक रेलगाड़ी के बैठकर अपने अपने गंतव्य की ओर जा रहे होंगे।

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