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Author: Rajendra

Member Since: Feb 18, 2018, 7:42 AM

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“मां क्या पापा मुझे xbox दिलाएंगे?” 12 साल के दक्ष ने उम्मीद भरी निगाहों से रीना को देखा। ”पता नहीं बेटा” उसने टका सा जवाब दिया।“माँ तुम क्या चाहती हो?” “में तो नहीं चाहती कि सिर्फ game खेलने के...

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रावण में अहंकार था तो पश्चाताप भी था रावण में वासना थी तो संयम भी था रावण में सीता के अपहरण की ताकत थी तो बिना सहमति परस्त्री को स्पर्श भी न करने का संकल्प भी था सीता जीवित मिली ये राम...

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Today I came across a news item related to the price hike in the JNU mess charges. I do not know when they were revised before this, but the prices itself are at extreme low side, even after the...

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लोग सच कहते हैं - औरतें बेहद अजीब होतीं है रात भर पूरा सोती नहीं थोड़ा थोड़ा जागती रहतीं है नींद की स्याही में उंगलियां डुबो कर दिन की बही लिखतीं टटोलती रहतीं है दरवाजों की...

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मैं कुछ कर रहा था, तभी किसी ने बताया की ‘वो’ आई है. मेरा दिल जोर से धड़कने लगा, उसका सामना करने के लिए शायद मैं तैयार नहीं था, पर मिलने का इंतज़ार भी था बरसों से. पल भर में वो सारी यादें आँखों के...

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हनीमून .. कल तुझे सैर करवाएंगे समन्दर से लगी गोल सड़क की रात को हार सा लगता है समन्दर के गले में ! घोड़ा गाडी पे बहुत दूर तलक सैर करेंगे धोडों की टापों से लगता है कि कुछ देर के राजा है हम...

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यही सिलसिला चलेगा । देखना तुम । दिन रात बारिश होगी । दीवालें सीलने लगेगीं । सीने पर बैठा बाज और भारी होता जाएगा । बैसाख में जला पठार, अपनी ही भस्म में अँखुआ रहा । हर जानने वाले के घर घुटी...

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जिंदगी के सफ़र में चलते चलते हर मुकाम पर यही सवाल परेशान करता रहा.... कुछ रह तो नहीं गया? 3 महीने के बच्चे को दाई के पास रखकर जॉब पर जानेवाली माँ को दाई ने पूछा... कुछ रह तो नहीं गया? पर्स,...

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पिछले हफ्ते अरसो बाद अपना गाँव देखा। सोचा था पूरा बदल गया होगा मगर पाया वही बचपन का गाँव कुछ नए जेवर पहने। उन यादों के एकहिस्से को ग़ज़ल में समेटने की कोशिश - यहां लोगों का मिट्टी से रिश्ता बाकी...

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इक बात होंठों तक है जो आई नहीं, बस आँखों से है झांकती, तुमसे कभी, मुझसे कभी, कुछ लफ्ज़ है वो मांगती, जिनको पहेन के होंठों तक आ जाए वो, आवाज़ की बाहों में बाहें डाल के इठलाये वो. लेकिन जो ये इक...

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मैं रोज़गार के सिलसिले में, कभी कभी उसके शहर जाता हूँ तो गुज़रता हूँ उस गली से| वो नीम तारीक सी गली और उसी के नुक्कड़ पे ऊँघता सा पुराना खम्बा उसी के नीचे तमाम शब इंतज़ार करके मैं छोड़...

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वो फिर से मेरे बगल से गुजर गयी… आज वो खाली थी. शायद मेरे ही जैसे किसी का इंतज़ार था उसे. मेरे मन ने भी आवाज़ दी - रुक जा दो मिनट बैठ जा. पर दिमाग ने समझाया नहीं अभी नहीं, अभी बहुत काम है. फिर कभी...

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